आयत के संदेश:
1-नबियों की सच्चाई वहाँ तक है कि अगर उनसे उनकी शक्ति को ले लिया जाये तो भी वह लोगों से सच की दावत दें। (وَلا أَقُولُ)
2-नबियों का काम, ख़ुराफ़ात व झूठ से मुक़ाबला करना करना है। (आयत के शब्दों के अनुसार)
3-नबियों से बेजा बातों की उम्मीद नही करना चाहिये...। (لاَّ أَقُولُ لَكُمْ عِندِي خَزَآئِنُ اللّهِ)
4-मार्गदर्शक का जीवन, उसका लक्ष्य, उसके काम का तरीक़ा लोगों के लिये साफ़ तौर पर बयान होना चाहिये।
5-लोगों को इस बात की इज़ाज़त न दो कि वह तुम्हे उससे ज़्यादा कहें जो तुम हो। (अगर बड़े लोग झूठे लक़बों से लोगों को रोक दें तो लोगो के हद से ज़्यादा बढ़ाने को रोका जा सकता है।)
6-नबी, पैसे, लोगों के डर, लालच, के लिये काम नही करते थे। ताकि लोग भी डर और लालच में उनके आसपास जमा न हो जायें। (और लोगों को यह ख़्याल नही करना चाहिये कि अगर वह नबियों के साथ रहेंगें तो उनके छुपी हुई बातों को जानने के कारण या अल्लाह के ख़ज़ाने के कारण उनकी मुश्किलें हल हो जायेगीं।)
7-पैग़म्बर (स) अपने जीवन और शासन के कामों के लिये दूसरे आम लोगों की तरह काम करते हैं, और ग़ैब के ज्ञान और अल्लाह के ख़ज़ाने के फ़ायदा नही उठाते, हाँ उन्हे अपनी नबी होने को साबित करने के लिये इन बातों से फ़ायदा उठाना पड़ता है।
8-पैग़म्बर (स) के पास ग़ैब का ज्ञान और अल्लाह का ख़ज़ाना नही होने के बावजूद उन पर वहयी आने के कारण उनकी बात मानना ज़रूरी है।
9-पैग़म्बर (स) के काम की बुनियाद न ही उसके ख़्याल और शिष्टता पर है और न ही समाज के चाहने या समाज में किसी बात के फैले हुए होने के कारण, बल्कि वह सिर्फ़ वहयी के अनुसार काम करता है....। (إِنْ أَتَّبِعُ إِلاَّ مَا يُوحَى إِلَيَّ)
10-नबियों की बातें मानना समझदारी और उनकी बातों से मुँह फेरना अंधेपन की निशानी है। (هَلْ يَسْتَوِي الأَعْمَى وَالْبَصِيرُ)
11-इंसान की सही सोच उसे नबियों की बात मानने का हौसला देती है और बहानों और बेजा उम्मीदों से बचाती है। (أَفَلاَ تَتَفَكَّرُونَ)
12-नबियों की बातें और उनके काम हमारे लिये दलील के तौर पर हैं। क्योकि वह वहयी की बुनियाद पर होती हैं।(إِنْ أَتَّبِعُ إِلاَّ مَا يُوحَى إِلَيَّ)
लोगों से मेलजोल का तरीक़ा सारे नबियों का एक जैसा होता है। यही बात हज़रते नूह भी लोगों से कहा करते थे। (सूरह हूद आयत