यह बात बता देना ज़रूरी है कि मरने वाले के वारिसों की गवाही और सौगन्ध का कारण यह है कि वह लोग पहले से उसके सामानों की, चाहे सफ़र से पहले का हो या बाद का सबकी, ख़बर रखते हैं।
आयत के संदेश:
- तुम्हे इन सब बातों के पता लगाने की कोई ज़रूरत नही है, लेकिन अगर कोई बात हाथ लग जाये तो अलग बात है। (राग़िब मुफ़रेदात में लिखते हैं कि जासूसी के बग़ैर कोई बात पता लगाने को असूर कहते हैं।)
ذَلِكَ أَدْنَى أَن يَأْتُواْ بِالشَّهَادَةِ عَلَى وَجْهِهَا أَوْ يَخَافُواْ أَن تُرَدَّ أَيْمَانٌ بَعْدَ أَيْمَانِهِمْ وَاتَّقُوا اللّهَ وَاسْمَعُواْ وَاللّهُ لاَ يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ 108
अनुवाद:
यह तरीक़ा हक़ीक़त से ज़्यादा नज़दीक है। इसलिये कि गवाही को अच्छी तरह से दे सकेंगें या इस बात से डरेंगें कि उनके सौगंध खाने के बाद मरने वाले वारिसों से सौगंध खिलायी जायेगी और अल्लाह से डरो (उसके आदेश) को मानो। अल्लाह निसंदेह बुरे गिरोह की मार्गदर्शन नही करता।
आयत की सूक्ष्मताएं:
यह आयत गवाही लेने और देने के कामों में सख़्ती और कठिनाई करने को बयान कर रही है। जैसा कि इससे पहली की दो आयतों में गुज़र चुका है। और नमाज़ के बाद लोगों के सामने सौगंध खाने से मालूम हो जायेगा कि उनकी यह क़समें झूठी हैं या सच्ची। इसलिये कि मुम्किन है कि अगर उनकी गवाही स्वीकार नही की गयी तो उनकी सौगंध और गवाही का विश्लास न होने के कारण समाज में उनकी हैसियत नही रह जाये।
आयत के संदेश:
1- ऐसे प्रोग्राम महत्व रखते है जो लोगों को उनका हक़ छिन जाने से बचाना चाहते हैं। (.....ذَلِكَ أَدْنَى أَن)
2- पाप से दूरी का एक कारण समाज में बदनामी से ख़ुद को बचाना है। (أَوْ يَخَافُواْ أَن تُرَدَّ أَيْمَانٌ)
3- ऐसे जीवन गुज़ारो कि लोगों को तुम्हारी सोच और तुम्हारी चीज़ों का पता हो ताकि झूठे बेधर्म लोग अपनी झूठी सौगंध से तुम्हारी मेहनतों को बर्बाद न कर सकें और यह जान जायें कि उनके झूठे बयान दूसरे सच्चे गिरोह के बयान से रद्द किये जा सकते हैं। (تُرَدَّ أَيْمَانٌ بَعْدَ أَيْمَانِهِمْ)
4- (सारी कठिनाईयों के बावजूद) तक़वा (अल्लाह का डर) ज़रूरी है।
5- झूठी गवाही देना फ़िस्क़ (धर्म से निकल जाना) की निशानी है। (وَاللّهُ لاَ يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ)
يَوْمَ يَجْمَعُ اللّهُ الرُّسُلَ فَيَقُولُ مَاذَا أُجِبْتُمْ قَالُواْ لاَ عِلْمَ لَنَا إِنَّكَ أَنتَ عَلاَّمُ الْغُيُوبِ 109
अनुवाद:
(याद करो) उस दिन को जब अल्लाह नबियों को जमा करेगा और उनसे पूछेगा: किस तरह तुम्हारी बातों का जवाब देते थे? तो वह सब कहेंगें: हम क्या कहें, तू ख़ुद ग़ैब (सबसे छुपी हुई बातें) की बातों को जानता है।
आयत की सूक्ष्मताएं:
वास्तविक ज्ञान अल्लाह के पास है और उसके अलावा जिसके पास भी इल्म है वह उसी से लिया गया है, जैसे कि ग़ैब (छुपी हुई बातें) का इल्म सिर्फ़ उसके पास है और वह जिसे चाहता देता है।
आयत के संदेश:
1- क़यामत में नबियों से भी सवाल किया जायेगा कि लोगों का उन के साथ कैसा सुलूक (बर्ताव) था। (مَاذَا أُجِبْتُمْ)
2- अल्लाह के इल्म (ज्ञान) के आगे नबियों के इल्म की कोई हैसियत नही है। (لاَ عِلْمَ لَنَا)
إِذْ قَالَ اللّهُ يَا عِيسى ابْنَ مَرْيَمَ اذْكُرْ نِعْمَتِي عَلَيْكَ وَعَلَى وَالِدَتِكَ إِذْ أَيَّدتُّكَ بِرُوحِ الْقُدُسِ تُكَلِّمُ النَّاسَ فِي الْمَهْدِ وَكَهْلاً وَإِذْ عَلَّمْتُكَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَالتَّوْرَاةَ وَالإِنجِيلَ وَإِذْ تَخْلُقُ مِنَ الطِّينِ كَهَيْئَةِ الطَّيْرِ بِإِذْنِي فَتَنفُخُ فِيهَا فَتَكُونُ طَيْرًا بِإِذْنِي وَتُبْرِىءُ الأَكْمَهَ وَالأَبْرَصَ بِإِذْنِي وَإِذْ تُخْرِجُ الْمَوتَى بِإِذْنِي وَإِذْ كَفَفْتُ بَنِي إِسْرَائِيلَ عَنكَ إِذْ جِئْتَهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُواْ مِنْهُمْ إِنْ هَـذَا إِلاَّ سِحْرٌ مُّبِينٌ 110
अनुवाद:
(ऐ पैग़म्बर याद करो) उस समय को जब अल्लाह ने मरियम के बेटे ईसा (अ) से कहा: मेरी उन नेमतों को याद करो जो मैने तुम पर और तुम्हारी माँ पर भेजीं, उस समय को जब (रूहूल क़ुदुस) से तुम्हे मज़बूती दी जब तुमने पालने में (चमत्कार से) और बड़े होने के बाद (वहीय) के ज़रीये लोगों से बातें कीं, और उस समय को जब किताब, बोध और इंजील का तुम्हे ज्ञान दिया, और (उस समय को न भूलना) जब मेरी इजाज़त से तुम मिट्टी से पंक्षी बना कर उसमें रूह (आत्मा) फूंकते थे और वह ज़िन्दा हो जाते थे और मेरी इजाज़त से तुम पैदाइशी अंधे और सफ़ेद दाग़ वालों को सही करते थे, मुर्दों को ज़िन्दा करते थे, (और उन्हे क़ब्रों से बाहर निकालते थे) और(याद करो) उस समय को जब बनी ईसराईल के अत्याचारिक हाथों को तुमसे दूर कर दिया, उस समय जब तुम उनके लिये रौशन दलीलें लाये और काफ़िरों ने उनके (चमत्कारों के) बारे में कहा: यह खुले हुए जादू के सिवा कुछ नही है।
आयत की सूक्ष्मताएं:
- इस आयत से लेकर आख़िरी आयत तक हज़रते ईसा (अ) का वर्णन है।
- इस आयत में अल्लाह की तरफ़ से मिलने वाली तरह तरह की नेमतों और बिल्कुल शुरु में हज़रते ईसा को रूहुल क़ुदुस से मज़बूती का वर्णन हुआ है।
शायद हज़रते ईसा की माँ मरियम पर नेमतों से मुराद ईसा की पैदाईश की बशारत (ख़ुशख़बरी) और उनका फ़रिश्तों से बातें करना हो। (आले इमरान 45 से 50 إِذْ قَالَتِ الْمَلآئِكَةُ يَا مَرْيَمُ)
आयत के संदेश:
1- अल्लाह का अपने प्रिय बंदों को अपनी नेमतों का याद दिलाना, हक़ के रास्ते पर चलने वालों के शौक़ को बढ़ाता है। (إِذْ)
2- नबियों को भी अल्लाह की नेमतों की याद से लापरवाह नही होना चाहिये।
3- औरत उस मंजिल तक पहुच सकती है। जहाँ नबियों के साथ उसका वर्णन होने लगता है। (عَلَيْكَ وَعَلَى وَالِدَتِكَ) बल्कि उस का उसके पैग़म्बर बेटे के एक ही आयत में वर्णन होता है। (दूसरी आयत में कहा गया है (और हमने उसे और उसके बेटे को निशानी क़रार दिया)
4- हज़रते ईसा ने पालने में बात करके अपने नबी होने को भी साबित कर दिया और अपनी माँ के चरित्र (पाकदामनी) को भी।
5- अल्लाह का संकल्प, अनुभव की ज़रूरत, क़ुदरत और वक़्त गुज़रने जैसे मसले को हल कर देता है। जैसे हज़रते ईसा बग़ैर किसी अनुभव और मेहनत और ज़माने के गुज़रने के, बचपने में ही उसी सच्ची बात को कहते हैं जो बड़े होने के बाद कहते है। (فِي الْمَهْدِ وَكَهْلاً)
6- नबियों के पास इल्म (ज्ञान) भी होना चाहिये। (الْكِتَابَ) और अक़्ल भी (وَالْحِكْمَةَ) और उन्हे गुज़री हुई बातों का भी ज्ञान होना चहिये। (وَالتَّوْرَاةَ) और उनके पास नया आयत के संदेश भी होना चाहिये। (وَالإِنجِيلَ)
7- पैदा करना और बनाना जैसे शब्द अल्लाह के अलावा दूसरों के लिये भी प्रयोग हो सकते हैं। (َإِذْ تَخْلُقُ) मगर उसकी इजाज़त से।
8- मिट्टी का जिस्म बनाना हज़रत ईसा के लिये अल्लाह की इजाज़त की वजह से जाएज़ हुआ। (بِإِذْنِي)
9- अल्लाह के ख़ास बंदों को अल्लाह ने (विलायते तकवीनी) चीज़ों के पैदा करने की ताक़त दी है।َتُبْرِىء ,فَتَنفُخَُ, تَخْلُقُ تُخْرِجُ यह सब ईसा के बारे में कहा गया है।
10- हज़रते ईसा के चमत्कार (मोजिज़ा) में उनकी मसीहाई का जलवा भी पाया जाता है और खिलौने बनाने की कला का भी। (كَهَيْئَةِ الطَّيْرِ .......فَتَنفُخُ)
11- हज़रत ईसा (अ) की मसीहाई ने बेजान चीज़ों में तो जान डाल दी मगर बनी ईसराईल के मुर्दा दिलों को ज़िन्दा न कर सके।
12- जहाँ भी शिक्र (कई अल्लाह मानना) का ख़तरा हो वहाँ तौहीद (अल्लाह को एक मानना) को याद दिलाना ज़रूरी है। (بِإِذْنِي) की तकरार से इसका पता चलता है।
13- जब अल्लाह नबियों को ज़िन्दा करने और बीमारों को ठीक करने की क़ुदरत देता है तो उनको वास्ता बनाना और उनसे मदद की प्रार्थना करना भी जाएज़ होना चाहिये। (जो लोग अल्लाह के अलावा किसी और से मदद माँगने के विरोधी हैं। उनसे हम कहते है कि क्या यह हो सकता है कि अल्लाह किसी को ताक़त तो दे, मगर लोगों को उनकी तरफ़ ध्यान देने से रोक दे?।)
14- मुर्दों को ज़िन्दा करना और रजअत (मरने के बाद ज़िन्दा होना) इसी दुनिया में हो चुका है। (تُخْرِجُ الْمَوتَى)
15- चमत्कार इस तरह का होना चाहिये कि विरोधियों के लिये शक की गुंजाइश बाक़ी न रह जाये। (تُخْرِجُ الْمَوتَى)
16- अल्लाह ने बनी ईसराईल को हज़रते ईसा के साथ बुरा सुलूक करने से रोका। (كَفَفْتُ)
وَإِذْ أَوْحَيْتُ إِلَى الْحَوَارِيِّينَ أَنْ آمِنُواْ بِي وَبِرَسُولِي قَالُوَاْ آمَنَّا وَاشْهَدْ بِأَنَّنَا مُسْلِمُونَ 111
अनुवाद:
और (याद करो) उस वक़्त को जब (ईसा के हव्वारीयून (दोस्तों) पर हमने वहयी नाज़िल की, कि मुझ पर और मेरे पैग़म्बर (दूत) पर ईमान लाओ तो उन्होने कहा: हम ईमान लाते हैं और ऐ अल्लाह तूझे गवाह बनाते हैं कि हम मुसलमान (और तेरे आदेश पर सर झुकाने वाले) हो चुके हैं।
आयत की सूक्ष्मताएं:
हव्वारीयून (ईसा के साथी) पर वहयी करने से मुराद उनके दिल में इस बात का ख़्याल डाल देना या हज़रते ईसा पर वहयी करके उन तक आयत के संदेश पहुचाना है।
आयत के संदेश:
1- कभी अल्लाह उन लोगों के दिलों में जो ईमान लाने के लिये तैयार हो चुके होते हैं इस तरह का ख़्याल डाल देता है।
2- अल्लाह पर ईमान लाना उसके नबी पर ईमान लाने से अलग नही है। (بِي وَبِرَسُولِي)
3- जब मार्गदर्शन दिल से और अल्लाह के लिये होता है तो जल्दी असर करता है। (قَالُوَاْ آمَنَّا........أَوْحَيْتُ)
4- जो लोग मार्गदर्शन पाना चाहते हैं। अल्लाह उनके दिल में एक नूर (रौशनी) डाल देता है। उसके बग़ैर मार्गदर्शन बेअसर, कम असर या जल्दी मिट जाता है।
5- अल्लाह का लोगों के दिलों में ख़्याल डालना, नबियों के रास्ते को सही बताना है, अलग से कोई चीज़ नही है। (أَوْحَيْتُ أَنْ آمِنُواْ بِي وَبِرَسُولِي)
6- दिली ईमान की निशानी ज़बान से ज़ाहिर और इक़रार करना है। इस तरह से कि तुम्हारी बातों में तुम्हारा वह ईमान नज़र आये। (وَاشْهَدْ بِأَنَّنَا مُسْلِمُونَ)
إِذْ قَالَ الْحَوَارِيُّونَ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ هَلْ يَسْتَطِيعُ رَبُّكَ أَن يُنَزِّلَ عَلَيْنَا مَآئِدَةً مِّنَ السَّمَاء قَالَ اتَّقُواْ اللّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ 112 قَالُواْ نُرِيدُ أَن نَّأْكُلَ مِنْهَا وَتَطْمَئِنَّ قُلُوبُنَا وَنَعْلَمَ أَن قَدْ صَدَقْتَنَا وَنَكُونَ عَلَيْهَا مِنَ الشَّاهِدِينَ 113
अनुवाद:
(याद करो) उस वक़्त को जब हव्वारीयून (ईसा के साथी) ने कहा: ऐ ईसा इब्ने मरियम क्या अल्लाह (आपकी दुआ से) आसमान से हमारे लिये खाना भेज सकता है? ईसा ने जवाब दिया: अगर मोमिन हो तो अल्लाह से डरो।
तो उन्होने ने कहा (हम किसी बुरे ख्याल से नही कह रहे हैं बल्कि) हम आसमानी खाना खाना चाहते हैं ताकि हमारे दिल को विश्वास आ जाये और हम जान जायें (और देखें) कि आपने हमसे सच कहा है और हम उस खाने पर गवाह रहें।