- आसमान से खाना मँगाने के कारण इस सूरह का नाम मायदा (दस्तरख़ान) पड़ गया।
- मायदा, खाने को भी कहते है और खाने के दस्तरख़ान के भी।
चुँकि हज़रते ईसा से उनका सवाल करने का अंदाज़ कुछ अच्छा नही था, (रूहूल्लाह (हज़रते ईसा का पुकारने का नाम) या रसूल्लाह कहने के बजाए उन्होने ईसा कहा, या यह कहने के बजाए कि क्या अल्लाह हम पर मेहरबानी कर सकता है उन्होने कहा, क्या अल्लाह इस बात की ताक़त रखता है कि..? या हमारा अल्लाह कहने के बजाए आपका अल्लाह कहा) इसलिये हज़रते ईसा ने कहा: अल्लाह से डरो।
आयत के संदेश:
1- अगर बुरा इरादा न भी हो तब भी बात और अंदाज़ से इंसान की इज़्ज़त का ख्याल रखना चाहिये। (ईसा का जवाब (اتَّقُواْ اللّهَ)
2- मोमिन इंसान के दिल में अल्लाह को आज़माने का ख़्याल भी नही आना चाहिये। (هَلْ يَسْتَطِيعُ?)
3- अपनी मेहनत और रोज़ी रोटी के काम को कभी कभी होने वाले (चमत्कारिक) काम से नही जोड़ना चाहिये बल्कि मेहनत और अल्लाह पर भरोसा करते हुए काम करके खाने का सोचना चाहिये। क्योकि यहाँ पर सिर्फ़ एक बार खाना मँगाने का वादा था हमेशा का नही। (مَآئِدَة)
4- अल्लाह से डरना ईमान की निशानी है। (اتَّقُواْ اللّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ)
5- ऐ पैग़म्बर, लोगों से ज़्यादा उम्मीद न रखो, ईसा के साथी जिन पर अल्लाह की तरफ़ से इलहाम (ख़्वाब या ख़्याल में बातें मालूम होना) होता था और वह ईमान और इस्लाम का इक़रार करते थे, इन बातों के बावजूद हमसे मुफ़्त का खाना या अपना मनचाहा चमत्कार चाहते हैं।
قَالَ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ اللَّهُمَّ رَبَّنَا أَنزِلْ عَلَيْنَا مَآئِدَةً مِّنَ السَّمَاء تَكُونُ لَنَا عِيداً لِّأَوَّلِنَا وَآخِرِنَا وَآيَةً مِّنكَ وَارْزُقْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ 114
अनुवाद:
मरियम के बेटे ईसा ने कहा: ऐ अल्लाह, ऐ मेरे मालिक, हमारे लिये आसमान से खाना भेज ताकि हमारे और दूसरों के लिये ईद (ख़ुशी का दिन) हो और तेरी तरफ़ से निशानी हो, और हमें रोज़ी अता कर कि निसंदेह तू श्रेष्ठ रोज़ी देने वाला है।
आयत की सूक्ष्मताएं:
क़ुरआन में सब जगह दुआ की शुरुआत (رَبَّنَا (हमारे अल्लाह) से होती है। मगर यहाँ पर दो शब्दों (اللَّهُمَّ رَبَّنَا) से दुआ की गयी है। शायद यहाँ पर ऐसा इस वाक़ेया की महत्व और इसके नतीजे की वजह से हो।
आयत के संदेश:
1- अल्लाह के प्रिय बंदो से दुआ कराना, उन्हे वास्ता बनाना और उनसे अपनी ज़रूरत को पूरा कराना जाएज़ है।
2- नबी (दूत) हर ज़माने के लोगों और वंशों का ख़्याल रखने वाले है। (لِّأَوَّلِنَا وَآخِرِنَا)
3- अल्लाह की निशानियों से हमेंशा सीख (सबक़) लेना चाहिये। (لِّأَوَّلِنَا وَآخِرِنَا)
4- ईद और ख़ुशी मनाना क़ुरआन की नज़र में सही है। (अल्लाह के प्रिय बंदो का जन्मदिन और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के नबी बनने का दिन आसमानी खाना आने वाले दिन से किसी तरह कम नही है।)
5- अल्लाह के नबी की ध्यान अपनी दुआ में खाना खाने के बजाए इस तरफ़ है कि वह खाना अल्लाह की तरफ़ से निशानी बन जाये। (َآيَةً مِّنكَ)
6- मोमिनों के बहानों और सफ़ाईयों को मान लेना चाहिये। (इससे पहले वाली आयत में खाना मँगाने की वजह बयान हो चुकी है। इस आयत में हज़रते ईसा ने दुआ और आसमानी खाना मँगाने के ज़रीये उनकी सफ़ाई को स्वीकार कर लिया है।)
7- लोगों के मशवरों और माँगों को मानना भी चाहिये और उन्हे पूरा भी करने चाहिये। (इससे पहले वाली आयत के अनुसार लोगों का खाना मँगाना खाने और विश्वास करने के लिये था, जिसमें खाने को पहले रखा गया था, हज़रते ईसा ने खाना मँगाया ताकि ईद हो, लोगों को विश्वास हो जाये, लोगों के लिये निशानी हो, और सब लोग खायें। दुआ में हज़रते ईसा ने एक तो ईद के शब्द को बढ़ा दिया और दूसरे उसके निशानी होने को खाने से पहले बयान किया है।
8- लोगों की ख़राब बातों को सही करके पेश करना चाहिये। (उन लोगों ने सवाल में कहा था (هَلْ يَسْتَطِيعُ رَبُّكَ) क्या आपका अल्लाह ऐसा कर सकता है? मगर हज़रते ईसा ने जवाब में श्रेष्ठ तरीक़े से और एक बड़े मक़सद को सामने रख कर दुआ की और उनकी शक वाली बातों को छोड़ दिया।)
9- दुआ में अल्लाह को दुआ से मिलते नाम से पुकारना चाहिये। (चुकि खाना माँगना था इस लिये (خَيْرُ الرَّازِقِينَ) कह कर दुआ की।)
قَالَ اللّهُ إِنِّي مُنَزِّلُهَا عَلَيْكُمْ فَمَن يَكْفُرْ بَعْدُ مِنكُمْ فَإِنِّي أُعَذِّبُهُ عَذَابًا لاَّ أُعَذِّبُهُ أَحَدًا مِّنَ الْعَالَمِينَ 115
अनुवाद:
अल्लाह ने कहा, बेशक मैं तुम्हारे लिये खाना भेजूंगा, फ़िर उसके बाद अगर तुम में से किसी ने मेरा इंकार किया तो उसे ऐसी सज़ा दूँगा कि इससे पहले दुनिया में किसी को न दी होगी।
आयत की सूक्ष्मताएं:
- आसमान से खाना आने का वर्णन जिस तरह क़ुरआन में आया है उस तरह इंजील में नही है। (तफ़सीरे नमूना)
- कुछ लोगों का कहना है कि हव्वारीयों (ईसा के साथी) ने आयत की धमकी सुनने के बाद अपनी बात वापस ले ली और आसमान से खाना नही आया, मगर यह बात क़ुरआन और हदीसों के ख़िलाफ़ है। (तफ़सीरे अतयबुल बयान)
- हदीसों में आया है कि आसमान से खाना आने के बाद भी कुछ लोगों ने अल्लाह का इंकार किया और सूवर की शक्ल में हो गये।
आयत के संदेश:
1- नबियों की दुआऐं स्वीकार हुआ करती हैं। (إِنِّي مُنَزِّلُهَا)
2- जो लोग इल्म (ज्ञान) और विश्वास के साथ इस तरह के चमत्कार के गवाह हैं उनका दायित्व ज़्यादा हैं। और विरोध करने की सूरत में उनकी सज़ा भी ज़्यादा कठोर है। (فَمَن يَكْفُرْ بَعْدُ مِنكُمْ) यह आयत लोगों को धमकाने वाली क़ुरआनी आयतों में सबसे सख़्त आयतों में से है।
3- जो लोग आम जीवन गुज़ारते हैं वह अल्लाह की सज़ा से ज़्यादा दूर हैं।
4- अल्लाह की सज़ा और करम दोनों के लिये बहुत से दर्जे है।
5- जो लोग ज़्यादा की उम्मीद करते हैं। (आसमानी खाना चाहते हैं) वह ज़्यादा उत्तरदायी भी होने चाहियें। (उँचे पहाड़ों के दामन में गहरी खाईयाँ भी होती है।)
इसके साथ साथ यह भी जानना चाहिये कि अगर ईसा के साथियों के लिये आसमान से खाना आ सकता है तो हदीसों के अनुसार, पैग़म्बरे इस्लाम (स) के लिये भी स्वर्ग से फ़ल आ सकता है और फ़ातेमा ज़हरा की पैदाईश का कारण बन सकता है।
وَإِذْ قَالَ اللّهُ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ أَأَنتَ قُلتَ لِلنَّاسِ اتَّخِذُونِي وَأُمِّيَ إِلَـهَيْنِ مِن دُونِ اللّهِ قَالَ سُبْحَانَكَ مَا يَكُونُ لِي أَنْ أَقُولَ مَا لَيْسَ لِي بِحَقٍّ إِن كُنتُ قُلْتُهُ فَقَدْ عَلِمْتَهُ تَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِي وَلاَ أَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِكَ إِنَّكَ أَنتَ عَلاَّمُ الْغُيُوبِ 116
अनुवाद:
और उस वक़्त जब अल्लाह ने कहा: ऐ मरियम के बेटे ईसा क्या तुमने लोगों से कहा है कि (अल्लाह के बजाए मुझे और मेरी माँ को अल्लाह मानों?) तो ईसा ने जवाब दिया: ( ऐ मेरे मालिक) तू पाक है, मुझे हक़ नही है कि मैं ऐसी बात कहूँ जो मुँझ में नही पायी जाती,और अगर ऐसी (ग़लत) बात मैंने कही होगी तो तू श्रेष्ठ जानता है। इसलिये कि तू दिलों की बातों को जानता है, यह मैं हूँ जो तेरे राज़ो को नही समझ सकता, बेशक तू छुपी हुई बातों का जानने वाला है।
आयत की सूक्ष्मताएं:
इसी सूरह की 109 वी आयत में गुज़रा है कि अल्लाह क़यामत में तमाम नबियों को जमा करके पूछेगा: लोगों ने तुम्हारी बातों का क्या जवाब दिया। इसी तरह यह आयत क़यामत के दिन अल्लाह और ईसा की उस दिन की बात को बयान करेगी।
अगरचे ईसाई हज़रते मरियम को अल्लाह नही मानते। मगर उनके मूर्ती के सामने खड़े होकर इबादत करना (पूजना) उन्हे अल्लाह बना देना है।
आयत के संदेश:
1- कभी दरवाज़े से कह कर दीवार को सुनाया जाता है। इसी तरह कभी एक से सवाल करके या उसे धमकी देके दूसरों को सुनाया जाता है। (أَأَنتَ قُلتَ)
2- (مِن دُونِ اللّهِ) शिर्क (अल्लाह को कई मानना) की निशानी है। ख़ुदा को न मानने की नही, यानी अल्लाह के अलावा ईसा और मरियम को अल्लाह मानना शिर्क और तसलीस (तीन को अल्लाह मानना) वाला अक़ीदा है। (हालाकि ईसाई जो तसलीस मानते हैं। वह बाप (अल्लाह), बेटा (ईसा) और रूहुस क़ुदुस (फ़रिश्तों का सरदार)है।)
3- इंसानों का अल्लाह होने का दावा करना ग़लत (बेबुनियाद) दावा है। (لَيْسَ لِي بِحَقٍّ)
4- अल्लाह के नबी मासूम (गुनाहों से पाक) होते हैं। (مَا يَكُونُ لِي أَنْ أَقُولَ مَا لَيْسَ لِي بِحَقٍّ)
5- नबी (दूत) अपने चाहने वालों से उनके हद से बढ़ा देने से बेज़ार हैं। (إِن كُنتُ قُلْتُهُ فَقَدْ عَلِمْتَهُ)[1]
6- अल्लाह इंसानों की अगली पिछली सारी बातों और सारे राज़ों को जानता है। (فَقَدْ عَلِمْتَهُ تَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِي)
7- अल्लाह की तरफ़ कोई बुरी या उसके शान के ख़िलाफ़ बात का संबंध जोड़ने से पहले उसकी तसबीह (तारीफ़) करना और उसे पाक क़रार देना ज़रूरी है। (سُبْحَانَكَ) [2]
مَا قُلْتُ لَهُمْ إِلاَّ مَا أَمَرْتَنِي بِهِ أَنِ اعْبُدُواْ اللّهَ رَبِّي وَرَبَّكُمْ وَكُنتُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا مَّا دُمْتُ فِيهِمْ فَلَمَّا تَوَفَّيْتَنِي كُنتَ أَنتَ الرَّقِيبَ عَلَيْهِمْ وَأَنتَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ 117
अनुवाद:
(ईसा ने अल्लाह से कहा:) मैंनें तेरे आदेश के सिवा उनसे कुछ नही कहा हैं। (मैंनें उनसे कहा है) कि अल्लाह की इबादत (पूजा) करो जो मेरा और तुम्हारा पालने वाला है। और जब तक मैं उनके दरमियान रहा (उनकी फ़िक्र और अल्लाह के बारे में अक़ीदे पर) गवाह रहा और उनकी देखरेख करता रहा, फ़िर जब तूने मुझे (उनके दरमियान से) उठा लिया तो ख़ुद उन पर नज़र रखे रहा और बेशक तू हर चीज़ पर गवाह है।
[1]- इमाम रज़ा (अ) कहते हैं: मेरे बारे में दो गिरोह हलाक होंगें। मगर उसमें मेरी कोई ग़लती नही होगी। एक वह लोग जो चाहने में हद से बढ़ जाते हैं और दूसरे जो बग़ैर किसी वजह के जलते हैं।
[2]- दूसरी आयत में आया है कि (وَقَالُوا اتَّخَذَ الرَّحْمَنُ وَلَدًا سُبْحَانَهُ) (सूरह अंबिया आयत 26) (وَيَجْعَلُونَ لِلّهِ الْبَنَاتِ سُبْحَانَهُ)(सूरह नहल आयत 57) जिसमें मुश्रिको के अक़ीदे के अनुसार अल्लाह के बेटे और बेटियाँ होने का वर्णन है। फ़िर कहा गया है अल्लाह इस अक़ीदे से पाक है कि उसके बच्चे हों।