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  • आयत के संदेश:  
  • 2010-02-23 11:14:31  
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  • नबी मासूम (पाप से पाक) होते हैं।और अल्लाह के आदेश के ख़िलाफ़ कोई काम नही करते है। और न ही उसकी वहयी (आयत के संदेश) में कोई फेर बदल करते है।

    अल्लाह के दूसरे बंदो की तरह हज़रते ईसा ख़ुद भी अल्लाह को अपना पालने वाला कह रहे है। (رَبِّي وَرَبَّكُمْ)[1]

    नबी लोगों के कामों की देखरेख करते हैं। (وَكُنتُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا)

    إِن تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَإِن تَغْفِرْ لَهُمْ فَإِنَّكَ أَنتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ 118

    अनुवाद:

    (ईसा ने कहा: ऐ मेरे अल्लाह) अगर तू उनको सज़ा देना चाहता है तो वह तेरे बंदे है और अगर माफ़ करना चाहता है तो निसंदेह तू इसकी ताक़त रखता है और तू हकीम है।

    आयत की सूक्ष्मताएं:

    अबूज़र की हदीस के अनुसार पैग़म्बरे अकरम (स) एक रात सुबह तक इस आयत को पढ़ते रहे, दोहराते रहे और रुकू व सजदे में पढ़ते रहे और अल्लाह से इस क़दर शिफ़ाअत (क़ौम के बख़्शवाने) की दुआ माँगी की आख़िर अल्लाह को स्वीकार करना पड़ी। (तफ़सीरे मराग़ी) हज़रत इस आयत को हाथ उठाये आँसूओ के साथ पढ़ते रहते और अपनी क़ौम के लिये दुआ करते रहते थे।

    आयत के संदेश:

    1. नबी (दूत) अल्लाह के आगे सर झुकाने वाले हैं।[2]
    2. अल्लाह की मुहब्बत या ग़ुस्सा उसकी (हिकमत) अक़्लमंदी की वजह से है। (الْحَكِيمُ)
    3. दुआ करते वक़्त उसकी रहमत को नही भूलना चाहिये। (فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ)
    4. तुम अपनी ज़िम्मेदारी (फ़र्ज़) को पूरा करो। नतीजा अल्लाह के हाथ में है।
    5. नबियों के पास शिफ़ाअत (बख़्शवाने) का हक़ है। लेकिन कभी पाप और जुर्म इतने ज़्यादा हो जाते है कि उन्हे भी अपना हाथ खैंचना पड़ता है। (إِن تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ)

    قَالَ اللّهُ هَذَا يَوْمُ يَنفَعُ الصَّادِقِينَ صِدْقُهُمْ لَهُمْ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا رَّضِيَ اللّهُ عَنْهُمْ وَرَضُواْ عَنْهُ ذَلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ 119 لِلّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَا فِيهِنَّ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ 120

    अनुवाद:

    अल्लाह ने कहा: यह ऐसा दिन है जिसमें सच वालों को उनका सच फ़ायदा पहुचाएगा, उनके लिये ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे से नहरें बह रही हैं वह उसमें हमेंशा हमेंशा रहेंगें। इस तरह से कि अल्लाह उनसे राज़ी होगा और वह अल्लाह से राज़ी होंगें। यह है उनके लिये बड़ी कामयाबी।

    आसमान व ज़मीन और जो कुछ भी उसमें है सब पर अकेले अल्लाह की हुकूमत और बादशाही है। और वह चीज़ पर क़ुदरत रखता है।

    आयत के संदेश:

    1. मोमिनीन ने अपने सच की वजह से अगर दुनिया में मुश्किलें बर्दाश्त कीं हैं तो उनका सच आख़िरत में उनका काम बना देगा।
    2. सिर्फ़ सच बोलने वाले फ़ायदा उठायेगें न कि ख़ाली सच का दावा करने वाले, ख़ाली सच का नारा लगाने वाले, ख़ाली ख़ुद को सच्चा ज़ाहिर करने वाले हैं।
    3. जिस बात की महत्व है वह यह है कि अल्लाह ख़ुद इंसान से राज़ी हो, न कि सिर्फ़ उसके काम से (कितने ही ख़राब लोग ऐसे होते हैं जिनके काम अच्छे होते हैं। और कितने ही ऐसे अच्छे काम वाले लोग है जो अल्लाह की नाराज़गी का शिकार हैं।)

    ( عَنْهُمْ)

    1. अल्लाह के राज़ी होने के साथ साथ स्वर्ग (जन्नत), बाग़, नहरें आदि इंसान की बहुत बड़ी कामयाबी है।
    2. इबादत (पूजना) के लाएक़ वह है जिसकी हुकूमत और ताक़त में सारी दुनिया हो और वह सब पर क़ुदरत रखता है। न कि ईसा और मरियम जैसे लोग ख़ुदा हो सकते हैं??

    (सूरए मायदा समाप्त)


    [1]- सूरह निसा की 172वी आयत में गुज़र चुका है कि हज़रते ईसा ख़ुद को अल्लाह का बंदा कहने में कोई शर्म नही करते थे।

    [2]- अल्लाह के काम के बारे में सवाल नही किया जा सकता। (لَا يُسْأَلُ عَمَّا يَفْعَلُ) (सूरह अंबिया आयत 23)

     
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