कार्यक्रम पश्चिम में नैतिक पवित्रता के लक्षण की एक अन्य कड़ी के साथ आपकी सेवा में उपस्थित हैं। पिछले कार्यक्रम में हमने बताया था कि पश्चिमी समाजों में जीवन शैली के बारे में नए विचार उभर कर सामने आ रहे हैं। युवाओं को निरंकुश छूट पर आपत्ति है और वह चाहते हैं कि आध्यात्म पर अधिक ध्यान दिया जाए। इस कार्यक्रम में हम पश्चिम में नैतिक पवित्रता के लक्षणों पर अपनी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।
पश्चिमी संचार माध्यम जो प्रचार करते हैं उसके विपरीत पश्चिम में नैतिकता की ओर युवाओं का झुकाव निरंतर बढ़ रहा है। इन युवाओं को यौन निरंकुशता पसंद नहीं है और उनका मानना है कि लड़कियों को शरीर को ढांकने वाले वस्त्र पहनना चाहिए। अनुसंधानिक संस्था आई-जी ने जो न्यूयार्क में स्थित हुं एक अनुसंधान किया जिससे पता चलता है कि न्युयार्क की लड़कियों को पिछली पीढ़ी के विपरीत अंग प्रदर्शन में रूचि है न छोटे और अधूरे वस्त्र पहनने में। इस संस्था की अनुसंधानकर्ता मेलीसा लैवीजेन का कहना है कि हमारे विचार में न्यूयार्क की लड़कियों पर किए गए अनुसंधान से जो आंकड़ा सामने आया है उससे यही लगता है कि वह पूरा शरीर ढांकने वाले वस्त्र पसंद करने लगी हैं। वह कहती हैं कि मेरे विचार में इसका मुख्य कारण इस नारे के नाम पर कि सब कुछ ख़त्म हो जाने वाला है, समाज में फैलने वाली निरंकुशता और अशलीलता है। इस निरंकुशता की प्रतिक्रया यह सामने आई है कि लड़कियों में शरीर ढांकने वाले उचित पहनावे का चलन बढ़ा है।
सुश्री लैवीजेन का मानना है कि कई दशकों तक अंग प्रदर्शन और छोटे कपड़ों के चलन के बाद अब लोगों में उचित कपड़ों का चलन बढ़ा है। आई-जी संस्था के अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि अच्छे पहनावे की ओर लड़कियों के रूजहान का एक और कारण, वर्तमान वातावरण को बदलने और सुरक्षा का वातावरण प्राप्त करने की चाहत है। इन अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि व्यवहारिक रूप से धर्म से लगाव गिरजाघरों में जाना और नग्नता की संस्कृति से लड़ना इस बात का चिन्ह है कि युवा पीढ़ी वातावरण और परिस्थितियों पर नियंत्रण करने और उसे बदलना चाहती है। इस समय बहुत सी पश्चिमी लड़कियों को पता चल चुका है कि अच्छा पहनावा व्यक्ति और समाज की पवित्रता और स्वस्थ जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है। जिस समाज में महिलाएं और लड़कियां निरंकुशता में नहीं पड़ी हैं वहां महिलाएं बड़ी आसानी से सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां कर सकती हैं।
पेन्सेलवैनिया विश्वविद्यालय की छात्रा क्लोई हर्ली ने वर्ष २००६ की बसंत ऋतु में अपने एक खुले ख़त में क्लास में उचित पहनावे का ध्यान न रखने वाले छात्र-छात्राओं पर आपत्ति जताई। उन्होंने मांग कि क्लास में छात्र उचित ड्रेस में आएं। इस पत्र के एक भाग में लिखा गया था कि क्या यह उचित नहीं है कि छात्रों का पहनावा एसा हो कि लगे कि वह क्लास को गंभीरता से ले रहे हैं। मेरे विचार में क्लास में उचित पहनावे का ध्यान रखना अन्य सहपाठियों और शिक्षक के साथ ही अपने आप को सम्मान देने के अर्थ में है। किसी बैठक में उचित पहनावे का ध्यान रखना इसका चिन्ह है कि आप बैठक में शामिल लोगों को सम्मान दे रहे हैं और आप ने इस बैठक में बहुत अच्छे ढंग से भाग लेने का मन बनाया है। समाचारों में सुनने को मिलता है कि कुछ पश्चिमी लड़कियां अनुचित कपड़ों के बारे में अपनी टिप्पणी दुकानदारों, संचार माध्यमों और समाचार पत्रों को भेज रही हैं और वह बहुत अधिक छोटे कपड़े पहनने को तैयार नहीं हैं।
वाशिंग्टन के सियाटेल क्षेत्र की निवासी एल्ला गंडरसन कहती हैं कि उन्होंने कुछ दिन पहले नार्ड स्ट्राम नामक शोरूम को एक पत्र लिखा और अपील की कि बड़े और उचित कपड़े क्यों नहीं लाए जाते। इस पत्र को संचार माध्यमों ने पेश किया जिस पर देश में पहनावे के विषय पर एक नई बहस आरंभ हो गई। इस पत्र के एक भाग में एल्ला ने लिखा है कि प्रबंधक महोदय नार्डस्ट्राम मैं एक लड़की हूं। मैं कपड़े ख़रीदने के लिए आपके शोरूम में आई तो मैंने देखा कि सारे कपड़े छोटे थे जो शरीर को उचित रूप से नहीं ढांक सकते। आपके सेल्समैन कहते हैं कि यही माडल हमारे पास है। तो एसे में लड़कियां अर्धनग्न दशा में सड़कों पर निकलने के लिए विवश हैं। मेरे विचार में इस स्थिति को बदलने की आवश्यकता है। कुछ महीने बाद नार्डस्ट्राम से कुछ लोगों ने एल्ला के पत्र के जवाब में उसे आश्वासन दिया कि वह इस इस समस्या का समाधान निकालने का प्रयास करेंगे।
इस समय युवाओं की ओर से अधूरे पहनावे पर आपत्तियां सामने आने के बाद पश्चिमी देशों के अनेक शोरूमों ने मिलकर इन युवाओं की पसंद के कपड़ों की प्रदर्शनी लगाई। इस प्रकार के भद्र पहनावे की पहली प्रदर्शनी वर्ष १९९९ में लगी। यह प्रदर्शनी उन अमरीकी माताओं की ओर से आयोजित की गई जिनकी बेटियां लड़कियों के उस समूह में शामिल थीं जो पवित्र जीवन और अच्छे पहनावे को पसंद करता है। वर्ष २००६ में इसी प्रकार की प्रदर्शनियां अमरीका के १७ नगरों में अमरीकी लड़कियों की ओर से लगाई गईं। सियाटेल नगर की १८ वर्षीय एक लड़की रैबिन हैं जिसका मानना है कि जो महिलाएं अंग प्रदर्शन वाले वस्त्र पहनती हैं वह वस्तुतः यह चाहती है कि लोग उनके इसी विदित रूप के आधार पर उनके बारे में फ़ैसला करें उनके मानवीय स्थान के आधार पर नहीं। महिला को यदि इसी दृष्टि से देखा जाने लगे तो समाज में उसका स्थान बहुत गिर जाएगा। रैबिन का मानना है कि जो महिला उचित पहनावे में रहती है वस्तुतः वह अपने व्यक्तित्व को विदित मापदंडों पर तोले जाने से सुरक्षित रखती है।
एसा लगता है कि उचित और सभ्य पहनावे के बारे में पश्चिमी समाजों की लड़कियों का संदेश धीरे धीरे समाज में अपना स्थान बनाता जा रहा है। कुछ ही समय पहले अमरीका की ३३ वर्षीय महिला मैगी ने पवित्रता की कला शीर्षक वाले अपने एक लेख में लिखा कि कुछ एसा करना चाहिए के पुरुष महिलाओं के विचारों आस्थाओं और मूल्यों पर ध्यान दें। यदि महिलाएं पुरुषों के लिए सजने संवरने से बचें तो पुरुष उन्हें एक मनुष्य के रूप में देखेंगे और उनके व्यक्तित्व के बारे में सोचेंगे। सुश्री मैगी कहती हैं कि मैं पूरा शरीर ढांकने वाले कपड़े पहनती हूं ताकि दूसरों को यह संदेश दे सकूं मेरा व्यक्तित्व मेरे विदित रूप तक सीमित नहीं है। यदि आप चाहते हैं कि आप का सम्मान बढ़े तो आप अपने पहनावे को ठीक करें। हालिया दिनों में पश्चिमी दशों में युवाओं ने पत्रकाओं और टीवी चैनलों पर अश्लील चित्र और फ़िल्में दिखाए जाने का विरोध किया है। बहुत से लोगों का मानना है कि अश्लील चित्र और उत्तेजक संगीत युवाओं को अनैतिकता की ओर ले जाता है। अमरीकी लेखिका सुश्री वेन्डी शालीत कहती हैं कि शायद नई पीढ़ी अपने माता पिता के विपरीत अपने दादा दादी और नाना नानी के उपदेशों को ध्यानपूर्वक सुने। बहरहाल युवा सामाजिक दृष्टिकोण बदलना चाहते हैं। जुलाई वर्ष २००५ में कुछ लड़कियों ने प्ले ब्वाए पत्रिका में छपने वाले अश्लील चित्रों के विरोध में लंदन में प्रदर्शन किया। लड़कियों ने यह मांग रखी कि पत्रिका इस प्रकार के चित्र न छापे।
ध्यान योग्य बिंदु यह है कि जिन समाजों में मा बाप शिक्षक और ज़िम्मेदार लोग पवित्र जीवन और नैतिक मूल्यों की उपेक्षा पर उकसाते हैं वहां युवा अपने लिए पवित्रता का मार्च चुनते दिखाई देते हैं। युवा पीढ़ी नए मापदंडों और उचित ढंग पर अधिक बल दे रही है। २९ वर्षीय रशीदा जूली भी संयम की क्लासों में युवाओं को अच्छे मापदंडों का पालन करने का सुझाव देते हुए कहती हैं। समाज में कुछ लोग प्रचलित तौर तरीक़े से हटकर जीवन व्यतीत करना चाहते हैं वह साहसी लोग होते हैं और हम सब पर उनका बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है हम भी अधिकांश लोगों में जड़ पकड़ चुकी नकारात्मक धारा के विपरीत दिशा में चल सकते हैं और अच्छी यादगार छोड़ सकते हैं। वह अपनी क्लासों में मां बाप से यह आग्रह करती हैं कि वह अपनी लड़कियों को नैतिक मूल्यों की सीख दें उनके भीतर अच्छे गुण विकसित करें ताकि युवा अभद्र बातों और परंपराओं के विपरीत क़दम उठाने का साहस जुटा सकें। पश्चिमी समाजों में पवित्रता की यह लहर शायद अभी बहुत व्यापक नहीं हुई है किंतु पश्चिम के बहके हुए निरंकुश समाज में युवाओं की विरोधपूर्ण आवाज़ गूंजने लगी है जो नई जीवन शैली की खोज में हैं। |