ArticleIDPicAddressSubjectDate
{ArticleID}
{Header}
{Subject}

{Comment}

 {StringDate}
 
 
 
 
 
 
 
ViewArticlePage
 
 
 
  • १३ आबान का विशेष कार्यक्रम   
  • 2010-02-23 12:43:29  
  • CountVisit : 271  
  • Sendtofriend
  •  
  •  
  • १३ आबान अर्थात चार नवंबर वह दिन है जब १९८९ में तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर जो एक जासूसी अड्डे में बदल चुका था विश्व विद्यालय छात्रों ने नियंत्रण कर लिया था। ईरान में इस दिन का नाम साम्राज्यवाद से संघर्ष का दिवस तथा छात्र दिवस रखा गया। इस नामकरण की जड़, ईरानी राष्ट्र से अमेरिका की शत्रुता में निहित है परंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान से अमेरिका की शत्रुता का कारण क्या है?

    यह वह प्रश्न है जिस पर प्रतिवर्ष साम्राज्य से संघर्ष के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर बहुत से विशेषज्ञ व वास्तविकता के जिज्ञासु ध्यान देते हैं। इस प्रश्न के उत्तर को साम्राज्य से संघर्ष और ईरानी राष्ट्र की न्याय प्रेम की भावना में खोजना चाहिये कि जो इस्लामी क्रांति के सफल होने और ईरान में अमेरिका के वर्चस्व के अंत होने का कारण बना।

    चार नवंबर का दिन ईरानी कैलेन्डर में विभिन्न कालों में तीन महत्वपूर्ण घटनाओं की याद दिलाता है। विदेशी साम्राज्य और देश की आंतरिक तानाशाही से संघर्ष के कारण चार नवंबर १९६४ को ईरान की इस्लामी व्यवस्था व क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय हज़रत इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैहि को शाह की अत्याचारी सरकार ने गिरफ्तार कर लिया और गिरफ्तारी के बाद सबसे पहले उन्हें तुर्की एवं उसके पश्चात इराक देश निकाला दे दिया। १४ वर्ष के पश्चात इसी दिन अर्थात चार नवम्बर १९७८ को विद्यार्थियों व छात्रों के बहुत से गुटों ने तेहरान में प्रदर्शन किया जिसमें शाह के सुरक्षा कर्मियों ने भारी रक्तपात किया। इसी कारण चार नवंबर के दिन को छात्र दिवस के रुप में याद किया जाता है। चार नवंबर १९७९ में भी तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर छात्रों ने नियंत्र कर लिया। उल्लेखनीय है कि तेहरान में अमेरिकी दूतावास ईरान के विरुद्ध जासूसी करने और ईरान के विरुद्ध नाना प्रकार के षडयंत्र रचने के अडडे में परिवर्तित हो गया था।

    इन तीनों महत्वपूर्ण घटनाओं में संयुक्त बिन्दु, ईरानी राष्ट्र का साम्राज्य विरोधी संघर्ष है जिसे ईरान की इस्लामी क्रांति के सफल होने तथा इस्लामी व्यवस्था का आधार समझा जाता है। यह तीनों घटनायें इस बात की सूचक हैं कि साम्राज्य से ईरानी राष्ट्र का संघर्ष केवल ईरान के राजनीतिक परिवर्तनों व संघर्षों तक सीमित नहीं है बल्कि यह ऐसी मज़बूत प्रक्रिया है जो प्रगतिशील एवं आरूढ़ है और उसकी जड़ें ईरान में अमेरिका की हस्तक्षेप पर आधारित नीतियों के विरुद्ध ईरानी जनता की न्यायप्रेम व संघर्ष की भावना में निहित हैं।

    1952-1953 के वर्षों में ईरानी जनता के स्वतंत्रताप्रेमी आंदोलन के दमन में अमेरिकी हस्तक्षेप विशेषकर १९ अगस्त १९५३ में होने वाले विद्रोह में अमेरिका और ब्रिटेन की सांठ- गांठ इस वास्तविकता की पुष्टि करती है कि अमेरिकी अधिकारी व राजनेता ईरान में अपनी स्थिति को मज़बूत बनाने के लिए ईरानी जनता की आकांक्षा की आपूर्ति की दिशा में बाधा बन गये तथा ईरानी राष्ट्र की प्रगति व विकास के मार्ग को बंद कर दिया।

    अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने राष्ट्रसंघ की महासभा की वार्षिक बैठक में अपने भाषण में वर्ष १९५३ में ईरान की क़ानूनी सरकार को गिराने में अमेरिका की सीधी भूमिका को स्वीकार किया और कहा, इस हस्तक्षेप पूर्ण कार्यवाही में वाशिंगटन का हाथ था। यह पहली बार था जब अमेरिका के किसी राष्ट्रपति ने वर्ष १९५३ में ईरान की क़ानूनी सरकार के विरुद्ध किये जाने वाले विद्रोह एवं तख़ता पलट में अमेरिका की भूमिका को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया। वर्ष १९५३ में होने वाला विद्रोह, निर्वाचित एवं क़ानूनी प्रधानमंत्री डाक्टर मोहम्मद मुसद्दिक़ की सरकार के गिरने का कारण बना। वास्तव में ईरान के विरुद्ध अमेरिका की हस्तक्षेपपूर्ण एवं शत्रुता पर आधारित नीति का अतीत चार दशक से अधिक पुराना है जिसकी भरपाई सरलता से संभव नहीं है।

    अमेरिकी राजनेताओं ने ईरान में अपनी उपस्थिति को सुदृढ़ बनाने और इसी प्रकार ईरान में अपने नागिरकों, कम्पनियों एवं पूंजीपतियों की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाने के उद्देश्य से अक्तूबर १९६४ में ईरानी राष्ट्र पर अपमानजनक क़ानून कैपीचूलेशन थोपने का प्रयास किया। इस क़ानून के आधार पर ईरान में मौजूद समस्त अमेरिकी अधिकारियों को, चाहें वे राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक जिस पद पर भी हों, क़ानूनी संरक्षण प्राप्त था परंतु स्वर्गीय हज़रत इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने २६ अक्तूबर १९६४ को अपने एक प्रसिद्ध भाषण में ईरानी जनता को अमेरिका की हस्तक्षेपपूर्ण नीतियों के विरुद्ध संघर्ष व उठ खड़े होने का आहृवान किया जो ईरानी जनता के आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा शाह के सुरक्षा कर्मियों द्वारा स्वर्गीय हज़रत इमाम ख़ुमैनी की गिरफ्तारी का कारण बना और चार नवंबर १९६४ में उन्हें तुर्की देश निकाला दे दिया गया।

    इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैहे व आलेह का देश से निष्कासन और १५ वर्षों तक उनकी देश से दूरी से आंतरिक तानाशाही और विदेशी साम्राज्य के विरुद्ध ईरानी जनता का संघर्ष न केवल रुका नहीं बल्कि फरवरी १९७९ में वह इस्लामी क्रांति की सफलता की भूमिका सिद्ध हुआ।
    ईरान की इस्लामी क्रांति की सफ़लता के आरंभ में ही ईरानी छात्रों द्वारा तेहरान में अमेरिकी जाजूसी अड्डे पर नियंत्रण, क्रांति के इतिहास में निर्णायक व महत्वपूर्ण घटना थी जो अमेरिकी अधिकारियों के लिए सीख का संदेश लिए हुए थी।

    वर्तमान समय में ईरान की इस्लामी क्रांति को सफल हुए ३० वर्ष का समय बीत रहा है और मौजूद प्रमाण इस बात के सूचक हैं कि अमेरिकी अधिकारी ईरानी राष्ट्र के साम्राज्य विरोधी संघर्ष के संदेश को सही तरह से नहीं समझ सके हैं। वर्ष १९५३ में ईरान की क़ानूनी सरकार के विरुद्ध विद्रोह में अमेरिका की गुप्तचर सेवा सीआईए की भूमिका, अमेरिकी राजनेताओं के प्रति ईरानी जनता के अविश्वास और घृणा के कारणों का मात्र एक भाग है।

    ईरान की शांतिपूर्ण परमाणु गतिविधियों से अमेरिका का ग़ैर क़ानूनी विरोध, ऊर्जा के संबंध में अमेरिका द्वारा ईरान और क्षेत्रीय देशों के साथ सहकारिता में नाना प्रकार के विघ्न, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान में व्याप्त अशांति में ईरान के हस्तक्षेप का आरोप, अमेरिका द्वारा उन आतंकवादी गुटों का समर्थन, जिनके हाथ ईरानी राष्ट्र के विरुद्ध नाना प्रकार के अपराधों से रंगे हुए हैं, ईरान के विरुद्ध अमेरिका की दूसरी शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियां हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने हिंसात्मक कार्यवाहियां तथा इराक व अफ़ग़ानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप और ज़ायोनी शासन का समर्थन करके क्षेत्र एवं विश्व जनमत में अपना कुरूप एवं घिनौना चेहरा प्रस्तुत किया है जो अमेरिकी अधिकारियों व राजनेताओं से क्षेत्र और विश्व की जनता की घृणा का कारण बना है।

    समस्त नारों एवं अतीत की ग़लतियों की स्वीकारोक्ति के बावजूद, अमेरिकी अधिकारी यथावत उसी ग़लत मार्ग पर चल रहे हैं और ईरान के विरुद्ध विश्व के अन्य देशों को उकसा व भड़का कर तेहरान के विरुद्ध प्रतिबंधों को और कड़ा करने के लिए विश्व समुदाय का आहृवान करते हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान के विरुद्ध प्रतिबंध लगाने के अतिरिक्त, ईरान की सम्पत्ति को ज़ब्तकर लिया और गत चार वर्षों के दौरान ईरान की शांतिपूर्ण परमाणु गतिविधियों के संदर्भ में नाना प्रकार के झूठों एवं निराधार दावों को आधार बनाकर सुरक्षा परिषद में उसके विरुद्ध ग़ैर क़ानूनी प्रस्ताव पारित कराये।
    बहुत से मौजूद प्रमाण व दस्तावेज़ इस बात के सूचक हैं कि अमेरिका, ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप पर आधारित अपने लक्ष्यों को साधने के लिए यथावत षडयंत्र रचता- रहता है तथा इसके लिए वह अवसर ढूंढने के प्रयास में रहता है।

    अमेरिका के इन हस्तक्षेपों का जारी रहना, इस बात का सूचक है कि गत ३० वर्षों के दौरान पश्चिम के षड़यंत्रों एवं फूट डालने वाली नीति के मुक़ाबले में ईरान की इस्लामी व्यवस्था के प्रतिरोध के अनुभव से अब भी कुछ पश्चिमी देशों ने पाठ नहीं लिया है परंतु जैसाकि ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्ला हिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनई ने बारम्बार बल देकर कहा है कि ईरान के विरुद्ध अमेरिका का षडयंत्र विफल हो चुका है। अमेरिकी अधिकारी पचास वर्ष पूर्व से ईरानी राष्ट्र के विरुद्ध षडयंत्र रचते- रहे हैं और इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद भी ईरान की प्रगति की प्रक्रिया में पैंतरा बदलकर वे बाधा उत्पन्न कर- रहे हैं परंतु इस प्रकार के टकराव का भविष्य पूरी तरह स्पष्ट है और इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस शत्रुतापूर्ण कार्यवाही में पराजय अमेरिका की होगी।

     
    FirstName :
    LastName :
    E-Mail :
     
    OpinionText :
    AvrRate :
    %0
    CountRate :
    0
    Rating :