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  • १२ फ़रवर्दीन ईरान का इस्लामी लोकतंत्र दिवस   
  • 2010-02-23 12:46:27  
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  • २९ वर्ष पूर्व आज ही के दिन, कि जब ईरान की इस्लामी क्रांति को सफल हुए दो महीने से कम का समय बीता था, वर्ष १९७९ में २९ और ३० मार्च को आयोजित होने वाले जनमत संग्रह के परिणामों की घोषणा कर दी गयी। ईरानी जनता ने इन दो दिनों में आयोजित होने वाले जनमत संग्रहों में इतने विस्तृत पैमाने पर और बढ चढकर भाग लिया कि ३१ मार्च वर्ष १९७९ को घोषणा की गयी कि ईरानी जनता ने अपने लिए इस्लामी व्यवस्था का चयन किया है। इससे पहले कि इस विषय की उपलब्धियों और भूमिका के बारे में बात करें, इस बिन्दु का उल्लेख आवश्यक है कि इस जनमत संग्रह की अपनी अलग विशोषता है जो विश्व की बड़ी क्रांतियों के इतिहास में अद्वितीय है।

    बड़ी क्रांतियों की समीक्षा इस बात की सूचक है कि किसी भी क्रांति में सरकार, क्रांति और जनता की राय का परिणाम नहीं होती।
    नेता और क्रान्तिकारी संगठन इसी सीमा तक जनता पर निर्भर रहते कि सत्ताधारी सरकार को गिरा लें तथा सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले लें।
    फ़्राँस या रुस की क्रांति में जनता से यह नहीं पूछा गया कि वह इन देशों के नरेशों की सरकार का अंत होने के बाद किस प्रकार की सरकार चाहती है परंतु ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय हजरत इमाम ख़ुमैनी को, जब वह निर्वासन का जीवन बिता रहे थे या जब वह ईरान में थे, सदैव इस्लामी शिक्षाओं और जनता की इच्छओं की चिंता थी। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद इमाम ख़ुमैनी रह को जनता से यह पूछने की कोई आवश्यकता नहीं थी कि वह किस प्रकार की सरकार चाहती है। क्योंकि ईरान की जनता ने शाह की अत्याचारी सरकार के विरुद्ध अपने विभिन्न प्रदर्शनों में नारे लगाकर यह बता दिया था कि उसे इस्लामी लोकतंत्र चाहिये। इन प्रदर्शनों में ईरानी जनता का नारा होता था न पूरब न पश्चिम, इस्लामी लोकतंत्र।

    इन सबके बावजूद स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने जनता की राय को महत्व देने और उस पर विश्वास रखने के कारण सरकार के निर्धारण के लिए जनमत संग्रह कराये जाने का आदेश दिया।
    इमाम ख़ुमैनी रह. द्वारा जनमत संग्रह कराये जाने का आदेश दिये जाने के बाद ईरानी जनता ने १९७९ में २९ और ३० मार्च को आयोजित होने वाले जनमत संग्रह में लाखों की संख्या में भाग लेकर देश की आगामी सरकार के बारे में अपनी राय की घोषणा की। मतगणना पूरी होने के बाद स्पष्ट हो गया कि ९८ दशमलव दो प्रतिशत मतदाताओं ने ईरानी में इस्लामी व्यवस्था की स्थापना के पक्ष में मतदान किया और जनता की भागीदारी से अपने भविष्य के निर्धारण के लिए इस्लामी सरकार की मांग की है। ईरान में इस्लामी लोकतंत्र की स्थापना से न केवल अपना भविष्य निर्धारित करने हेतु जनता की मांग व्यवहारिक हुई और उसके लिए स्वतंत्रता व आज़ादी का उपहार लाई बल्कि उसने वंचितों एवं कमज़ोरों के संबंध में ईश्वरीय वचन को प्रतिबिंबित भी किया। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रह. ने ३१ मार्च सन १९७९ में जनमत संग्रह के परिणामों की घोषणा के बाद एक संदेश में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए इस जनमत संग्रह को एक बहुत बड़ी सफलता बताया। इमाम ख़ुमैनी ने अपने संदेश के एक भाग में कहा कि १२ फरवरदीन अर्थात ३१ मार्च की सुबह, जो ईश्वरीय आदेशों से बनने वाली सरकार का पहला दिन है, हमारी सबसे बड़ी धार्मिक एवं राष्ट्रीय ईद है और ईरानी जनता को चाहिये कि वह इस महान दिन को ईद मनायें तथा इसे सुरक्षित रखे। यह वह दिन था जब २५०० वर्षीय पुराने अत्याचारी शाही शासन का अंत हो चुका था और शैतान का वर्चस्व सदैव के लिए ईरान से समाप्त हो चुका था तथा वँचितों की सरकार ने उसका स्थान ले लिया।

    २९ और ३० मार्च को आयोजित होने वाले जनमत संग्रह के अवसर पर देश के भीतर से कुछ गुटों एवं धड़ों तथा जनता की पंक्तियों में फूट डालने के लिए पश्चिम की बड़ी शक्तियों की ओर से राजनीति से प्रेरित दुष्प्रचार के खतरे से अवगत इमाम ख़ुमैनी ने, जनता को सावधान करते हुए कहा था, आप इस्लामी लोकतंत्र को वोट दें, न एक शब्द अधिक न एक शब्द कम। इमाम ख़ुमैनी द्वारा लोकतंत्र के शब्द पर बल दिये जाने का अर्थ यह था कि वह जनता के भविष्य के निर्धारण के लिए उसकी राय से बनने वाली व्यवस्था में गहरा विश्वास रखते थे। इस्लामी शब्द भी ईरानी व्यवस्था की पहचान एवं दूसरी लोकतांत्रिक व्यवस्थओं से उसकी अलग पहचान का सूचक है। इस प्रकार इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था की अपनी अलग विशेषता है जिसके समस्त मामलों में ईश्वरीय मूल्यों एवं कुर्आनी शिक्षाओं को दृष्टि में रखा गया है।

    ३१ मार्च को जनमत संग्रह के परिणामों की घोषणा के बाद इमाम ख़ुमैनी रह. ने एक संदेश में ईरानी जनता की एकजुटता की सराहना की। इस संदेश में आया था,, मैं विश्ववासियों के लिए घोषणा करता हूं कि ईरान के इतिहास में इस प्रकार का जनमत संग्रह कभी नहीं हुआ है जिसमें समूचे ईरान की जनता पूरे उत्साह के साथ मतदान केन्द्रों पर उपस्थित हुई हो और उसने मतपेटियों में अपना सकारात्मक मत डाला हो तथा अत्याचारी सरकार को सदा के लिए इतिहास के कूड़ेदान में दफ्न कर दिया हो।

    वर्तमान समय में ईरान की इस्लामी व्यवस्था को विश्व में एक आदर्श प्रजातंत्र के रूप में देखा जाता है और वह ईश्वरीय शिक्षाओं तथा जनता की राय पर आधारित एक आदर्श सरकार है। गत ३० वर्षों के दौरान ईरान विश्व में धार्मिक लोकतंत्र का उदाहरण रहा है। ईरान में इस्लामी व्यवस्था की स्थापना से यह बिन्दु सिद्ध हो गया कि पूर्वी ब्लाक के विघटन के बाद अमेरिकी दावों के विपरीत लिबरल प्रजातंत्र ही सरकार बनाने के लिए एकमात्र विकल्प नहीं है बल्कि इस्लाम, प्रजातंत्र तथा जनता के भविष्य के निर्धारण के लिए परिपूर्ण उदाहरण व आदर्श है।

    ईरान की इस्लामी व्यवस्था को समाप्त करने या उखाड़ फेकने के लिए अमेरिका के राजनीतिक, अर्थिक, सांस्कृतिक यहां तक सैनिक षडयंत्रों के आरंभ होने का मूल कारण अत्याचारग्रस्त जनता के लिए इस व्यवस्था को आदर्श बनने से रोकना है। विद्रोह का षडयंत्र, ईरान के केन्द्र में स्थित तबस मरूस्थल में अमेरिका का सैनिक आक्रमण, इराक द्वारा ईरान पर थोपे गये ८ वर्षीय युद्ध को ईरान की इस्लामी व्यवस्था को समाप्त करने हेतु अमेरिका की कुछ कार्यवाहियां हैं। अमेरिका की उक्त समस्त कार्यवाहियां ईरान की जागरूक मुसलमान जनता के प्रतिरोध से विफल हो गयीं और इस्लामी गणतंत्र ईरान वर्तमान समय में पहले से अधिक शक्तिशाली, तथा दूसरे राष्ट्रों विशेषकर इस्लामी जगत के लिए एक आदर्श में परिवर्तित हो गया है।

     
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