जून १९६३ में आंतरिक तानाशाही और विदेशी साम्राज्य के विरुद्ध ईरानी जनता का रक्तरंजित आंदोलन इस देश के समकालीन इतिहास में एक मोड़ है। ईरान में १५ ख़ुर्दाद के नाम से प्रसिद्ध आंदोलन वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद देश की दो बड़ी घटनाओं का मिलाप बिन्दु है। 15 खुर्दाद के आंदोलन से १० वर्ष पूर्व क़ानूनी एवं ईरानी जनता द्वारा चुनी गई सरकार अमेरिका, ब्रिटेन और शाह के दरबार के संयुक्त विद्रोह में अगस्त १९५३ में गिर गई और शाह पुन: ईरान लौट आया जबकि वह ईरान की क्रांतिकारी जनता के भय से देश से भाग गया था।
अमेरिकी पिट्ठू शाह की सत्ता में वापसी/ क्रांतिकारियों और शाही सरकार के विरोधियों के दमन, यातना और उन्हें फांसी देने का आरंभिक बिन्दु थी। शाही सरकार और उसके पश्चिमी समर्थकों विशेषकर अमेरिका ने अगस्त १९५३ के विद्रोह के बाद ईरान की स्थिति को अपनी साम्राज्यवादी योजनाओं को व्यवहारिक बनाने के लिए उचित समझा। वर्ष १९६० के दशक के आरंभ से, जो अमेरिका में जान एफ कैनेडी का राष्ट्रपति काल था, ईरान की समस्त चीज़ों पर वर्चस्व जमाने हेतु वाइट हाउस की नीतियां व योजनायें लागू हो गयीं। अमेरिका मध्यपूर्व में ईरान को अपने मुख्य ठिकाने में परिवर्तित करने के प्रयास में था साथ ही वह ईरान की मंडी को अमेरिका की निर्मित वस्तुओं और हथियारों की उपभोक्ता मंडी में बदलना बनाना चाहता था। हुआ भी ऐसा ही परंतु दोनों उक्त लक्ष्यों के साथ अमेरिका तथा उसके पिट्ठू शाह एक दूसरा महत्वपूर्ण लक्ष्य भी प्राप्त करने की चेष्टा में थे जो उनके अनुसार काफी महत्वपूर्ण था। चूंकि ईरान को परोक्ष रूप से अमेरिका की साम्राज्यवादी छावनी में परिवर्तित करना था इसलिए पश्चिम की अश्लील संस्कृति को ईरानी जनता की इस्लामी पहचान तथा स्थानीय संस्कृति का स्थान लेना चाहिये था। ईरान के आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक ढांचे को परिवर्तित होना चाहिये था ताकि ईरान वाइट हाउस की नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए मध्यपूर्व व स्वयं ईरान में अमेरिका की सुरक्षित छावनी में परिवर्तित हो सके।
अगस्त १९५३ से जून १९६३ तक का समय ईरान के लिए मौन व पतन का दशक था। अमेरिका और शाह की आर्थिक योजनाओं ने ईरान को पूर्णरूप से दूसरों देशों पर निर्भर बना दिया और पश्चिम से आने वाली अश्लील संस्कृति ने अपने अभूतपूर्व धावे में ईरानी समाज से इस्लामी पहचान को महत्वहीन बनाने तथा ईरानी संस्कृति को किनारे डाल देने का प्रयास किया। पश्चिमी, उन वर्षों में ईरान को स्थिरता का टापू कहते थे और यह कल्पना करते थे कि ईरान में सदैव मौन का वातावरण छाया रहेगा पंरतु ईरान की मुसलमान जनता के साहसी व महान नेता स्वर्गीय हज़रत इमाम ख़ुमैनी के आंदोलन ने उस दशक के मौन को समाप्त कर दिया और ईरानी जनता का जागरुक होने के लिए आहृवान किया। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी एकमात्र वरिष्ठ धर्मगुरू और राजनीतिक व्यक्ति थे जिन्होंने ईरान में अमेरिका के तथाकथित सुधार के ख़तरनाक परिणामों के बारे में चेतावनी दी थी।
इमाम ख़ुमैनी ने वर्ष १९६२, १९६३ में विज्ञप्तियां जारी करके और भाषण देकर ईरानी जनता के समक्ष अमेरिका तथा शाह की साम्राज्यवादी योजनाओं का रहस्योदघाटन किया। इमाम खुमैनी ने दसवीं मोहर्म अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम के प्राणप्रिय नाती हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शहीदी दिवस पर पवित्र नगर क़ुम के धार्मिक शिक्षा केन्द्र मरसए फ़ैज़िया में कड़ा भाषण दिया जिसमें उन्होंने शाह की सरकार तथा उसके अमेरिकी समर्थकों के अपराधों को स्पष्ट शब्दों में बयान किया। इमाम खुमैनी के इस एतिहासिक भाषण के तीन दिन बाद 15 खुर्दाद वर्ष १३४२ हिजरी शम्सी अर्थात ५ जून १९६३ को भोर में शाह के सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें क़ुम से गिरफ्तार करके तेहरान स्थानांतरित कर दिया। ईरानी जनता के धार्मिक एवं राजनीतिक नेता की गिरफ्तारी के कुछ घटों बाद सबसे पहले पवित्र नगर क़ुम, उसके बाद तेहरान तथा दूसरे नगरों में ईरान की क्रांतिकारी जनता सड़कों पर निकल कर "या मौत या ख़ुमैनी" का नारा लगाने लगी। शाह भी ईरानी जनता के इतिहासिक प्रतिरोध को कुचलने के लिए टैंको को सड़कों पर ले आया और काफी संख्या में जनता का रक्तपात किया।
इस घटना के एक दिन बाद समाचार पत्र अलअहराम ने लिखा" हालिया दस वर्षों के दौरान शाह के विरुद्ध यह सबसे बड़ा प्रदर्शन था और यह उस समय आरंभ हुआ जब ईरानी जनता के धार्मिक नेता आयतुल्लाह ख़ुमैनी और उनके समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया गया"
इस कार्यक्रम के आरंभ में ही हमने संकेत किया था कि 15 खुर्दाद के नाम से ईरान में प्रसिद्ध घटना देश के समकालीन इतिहास में दो बड़ी घटनाओं का मिलाप बिन्दु है। 15 खुर्दाद के प्रतिरोध के १० वर्ष पहले ईरान की क़ानूनी सरकार अमेरिका, ब्रिटेन और शाह के संयुक्त विद्रोह से गिर गई थी। 15 खुर्दाद की घटना के पंद्रह वर्ष बाद इस्लामी क्रांति भी सफल हुई। क़ुम और तेहरान में जनता के भारी रक्तपात के बाद इमाम ख़ुमैनी की गिरफ्तारी का समाचार पूरे ईरान तथा विश्व के दूसरे देशों में बिजली की तरह फैल गया जबकि शाह की सरकार ने सेन्सर लगा रखा था तथा देश में घुटन का वातावरण व्याप्त था। इराक़ के पवित्र नगरों कर्बला, नजफ और काज़ेमैन के शिक्षा केन्द्रों ने इस्लामी देशों के शासकों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों व संस्थाओं के नाम अलग अलग पत्र भेजकर 15 खुर्दाद की घटना की तीव्र भर्त्सना की। मिस्र के अंतर्राष्ट्रीय विश्व विद्यालय अलअज़हर के तत्कालीन प्रमुख ने 15 खुर्दाद की घटना के ६ दिन बाद एक विज्ञप्ति जारी करके धर्मगुरूओं की गिरफ्तारी एवं उनके अपमान की निंदा की और शाह की सरकार से धर्मगुरूओं पर हो रहे अत्याचार को बंद करने तथा इमाम ख़ुमैनी को यथाशीघ्र रिहा किये जाने की मांग की। स्वर्गीय हज़रत इमाम ख़ुमैनी लगभग १० महीनों तक जेल में रहे और जेल से स्वतंत्र होने के पश्चात उन्हें देश निकाला दे दिया गया।
ईरान की इस्लामी व्यवस्था के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी ने 15 खुर्दाद के रक्त रंजित आंदोलन के बारे में कहा है" 15 खुर्दाद का दिन इसके साथ कि वह दसवीं मोहर्रम की भांति ईरान की अत्याचारग्रस्त जनता के लिए शोक का दिन है, इतिहास में मानवीय मूल्यों के सम्मान का दिन है"
शाह और अमेरिका के विचार में इमाम ख़ुमैनी को देश निकाला देकर उनके तथा ईरानी जनता के मध्य भौगोलिक दूरी उत्पन्न करके ईरान में अमेरिका व शाह की साम्राज्यवादी व तानाशाही नीतियों के विरुद्ध जनता की आपत्तियों का अंत किया जा सकता है परंतु वास्तविकता कुछ और थी। क्योंकि 15 खुर्दाद को दमन किये गये प्रतिरोध ने ईरानी समाज में इस्लामी पहचान और राजनीतिक सूझ बूझ को जीवित कर दिया। 15 खुर्दाद के आंदोलन ने "धर्म से राजनीति के अलग" होने के साम्राज्यवादी सिद्धांत को समाप्त कर दिया और शुद्ध इस्लाम को उस इस्लाम से अलग कर दिया जिसे इमाम ख़ुमैनी ने अमेरिकी इस्लाम कहा था।
इमाम खुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने 15 खुर्दाद की घटना की बरसी के उपलक्ष्य में अपने एक भाषण में इस प्रकार कहा है" कि 15 खुर्दाद के प्रतिरोध ने शाह की अत्याचारी सरकार के शक्ति व जादू के प्रतीक को तोड़ दिया"
15 खुर्दाद के दिन साहसी युवाओं, महिलाओं और पुरुषों की शहादत ने शैतानी शक्तियों की जड़ों को हिलाकर रख दिया। क्रांतिकारी व बहादुर युवाओं के खून ने अत्याचारियों के महलों में कंपन उत्पन्न कर दिया और ईरान की बहादुर जनता ने प्रतिरोध, त्याग तथा अपने बेटों का लहू देकर भावी पीढ़ी के लिए प्रतिरोध का मार्ग प्रशस्त कर दिया और असंभव को संभव बना दिया।