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حقایق قرآن
 
आयत के संदेश: नबी मासूम (पाप से पाक) होते हैं।और अल्लाह के आदेश के ख़िलाफ़ कोई काम नही करते है। और न ही उसकी वहयी (आयत के संदेश) में कोई फेर बदल करते है। अल्लाह के दूसरे बंदो की तरह हज़रते ईसा ख़ुद भी अल्लाह को अपना पालने वाला कह रहे है। (رَبِّي وَرَبَّكُمْ) नबी लोगों के कामों की देखरेख करते हैं। (وَكُنتُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا) إِن تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَإِن تَغْفِرْ لَهُمْ فَإِنَّكَ أَنتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ 118 आयत की सूक्ष्मताएं: - आसमान से खाना मँगाने के कारण इस सूरह का नाम मायदा (दस्तरख़ान) पड़ गया। - मायदा, खाने को भी कहते है और खाने के दस्तरख़ान के भी। चुँकि हज़रते ईसा से उनका सवाल करने का अंदाज़ कुछ अच्छा नही था, (रूहूल्लाह (हज़रते ईसा का पुकारने का नाम) या रसूल्लाह कहने के बजाए उन्होने ईसा कहा, या यह कहने के बजाए कि क्या अल्लाह हम पर मेहरबानी कर सकता है उन्होने कहा, क्या अल्लाह इस बात की ताक़त रखता है कि..? या हमारा अल्लाह कहने के बजाए आपका अल्लाह कहा) इसलिये हज़रते ईसा ने कहा: अल्लाह से डरो।
 
 
 
 
 
محمد رسول الله
 
शहादते इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम जो कोई भी इस्लाम के इतिहास का न्याय के साथ अध्ययन करे तो उसे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के परिजनों की केंद्रीय भूमिका के बारे मंन पता चल जाएगा। इन महान हस्तियों को उनके व्यक्तिगत गुणों तथा पैग़म्बर से निकटता के कारण सदैव ही लोगों के बीच विशेष लोकप्रियता प्राप्त रही है। मुसलमानों के हृदयों में उनके प्रेम का सागर उमड़ता रहता है और जब तक यह संसार बाक़ी है, लोगों के हृदयों में यह पवित्र प्रेम मौजूद रहेगा। ज़िलहिज्जा महीने की सातवीं तारीख़, पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों में से एक अर्थात इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की शहादत की तिथी है। वर्ष ११४ हिजरी क़मरी में ज़िल्हिज्जा महीने की सातवीं तारीख़ को इस्लामी जगत इस महान इमाम की शहादत के दुख में डूब गया था। इस अवसर पर हम आप सभी की सेवा में हार्दिक संवेदना प्रकट करते हुए, इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के जीवन के कुछ आयामों पर प्रकाश डाल रहे हैं, कृपया हमारे साथ रहिए। पैग़म्बरे इस्लाम की निष्ठावान पत्नी हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी की सार्वजनिक घोषणा के दस वर्ष बाद पैग़म्बरे इस्लाम स की पत्ती हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा ने संसार से विदा ली। यह दिन पैग़म्बरे इस्लाम स और हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के संयुक्त जीवन का अंतिम बिंदु था। हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के निधन से पैग़म्बरे इस्लाम शोक व दुख के अथाह सागर में डूब गए। पैग़म्बरे इस्लाम स पर दुखा का यह पहाड़ उनके चाचा हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम के निधन के स्वर्गवास के कुछ थोड़े से अंतराल के बाद टूट पड़ा। इन दो प्रियतम हस्तियों के वियोग से पैग़म्बरे इस्लाम की आत्मा इतनी दुखी हुई कि उन्होंने इस वर्ष को शोकवर्ष का नाम दे दिया। हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाहे अलैहा के निधन पर पैग़म्बरे इस्लाम स बहुत रोए और उन्होंने कहाः ख़दीजा के जैसा कहां कोई मिल सकता है कि उन्होंने उस समय मेरी पुष्टि की जब लोग मुझे झुठला रहे थे। ईश्वरीय धर्म के मामलों में उन्होंने मेरी सहायता की और सहायता के लिए अपनी संपत्ति पेश कर दी।
 
 
 
 
 
سیرت معصومین(ع)
 
महिला जगत आज विवाह के संबंध में बात-चीत करेंगे। यह ऐसा विषय है जो युवावस्था में प्राय: एक समस्या के रूप में सामने आता है। आरम्भ में हम इस्लामी देशों में विवाह के विषय पर चर्चा करेंगे। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपने एक विख्यात कथन में विवाह को अपनी परम्परा का एक भाग बताया है। पहला बाब लिबास के आदाब और आरास्तगी ए लिबास की फ़ज़ीलत अकसर मोतबर हदीसों से साबित है कि अपने मुनासिबे हाल नफ़ीस और उम्दा लिबास, जो हलाल कमाई से मिला हो पहनना सुन्नते पैग़म्बर (स) और ख़ुदा की ख़ुशनूदी हासिल करने का सबब है और अगर तरीक़ ए हलाल से मयस्सर न हो तो जो मिल जाये उस पर क़नाअत कर ले। यह न हो कि तरह तरह के लिबास हासिल करने की फ़िक्र इबादते ख़ुदा में हरज पैदा करने लगे अगर हक़ तआला किसी की रोज़ी में इज़ाफ़ा करे तो मुनासिब है कि उसके मुताबिक़ खाये, पहने, ख़र्च करे और बरादराने ईमानी के साथ मेहरबानी करे और जिस की रोज़ी तंग हो उसे लाज़िम है कि क़नाअत करे और अपने आप को हराम और वह चीज़ें जिन के जायज़ होने का यक़ीन नही है उन से परहेज़ करे।
 
 
 
 
 
نقد اديان و مذاهب
 
पश्चिम में नैतिक पवित्रता के लक्षण १ मनुष्य प्राकृतिक रूप से सच्चाई और पवित्रता से प्रेम करता है। अनुभवों से पता चला है कि मनुष्य विशेष रूप से महिलाओं में नैतिक मूल्यों से जितना प्रेम होता है वह उनती ही अधिक सुरक्षित होती हैं। जिन लोगों को पवित्र शिष्टाचार का अनुभव है वह इसे मानव जीवन का आवश्यक भाग मानते हैं। इस समय पश्चिम की नई पीढ़ी में नैतिक मूल्यों के पालन निरंकुशता से दूरी का रुजहान देखने में आ रहा है। इस कार्यक्रम में हम एसे ही कुछ उदाहरणों की ओर संकेत करेंगे। पश्चिम में नैतिक पवित्रता के लक्षण २ कार्यक्रम पश्चिम में नैतिक पवित्रता के लक्षण की एक अन्य कड़ी के साथ आपकी सेवा में उपस्थित हैं। पिछले कार्यक्रम में हमने बताया था कि पश्चिमी समाजों में जीवन शैली के बारे में नए विचार उभर कर सामने आ रहे हैं। युवाओं को निरंकुश छूट पर आपत्ति है और वह चाहते हैं कि आध्यात्म पर अधिक ध्यान दिया जाए। इस कार्यक्रम में हम पश्चिम में नैतिक पवित्रता के लक्षणों पर अपनी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।
 
 
 
 
 
امام مهدی (عج)
 
ज़हूर का ज़माना पहला हिस्सा ज़हूर से पहले दुनिया की हालत प्रियः पाठकों ! हम ने पिछले अध्यायों में इमामे ज़माना (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहू शरीफ़) की ग़ैबत और उसके कारणों का उल्लेख किया है। हम ने बताया कि अल्लाह की वह आख़िरी हुज्जत ग़ायब हो गये हैं और जब उनके ज़हूर का रास्ता हमवार हो जायेगा तो वह ज़ाहिर हो कर दुनिया को अपनी हिदायत व मार्गदर्शन से लाभान्वित करेंगे। ग़ैबत के ज़माने में लोग ऐसे काम कर सकते हैं जिनसे इमाम (अ. स.) के ज़हूर का रास्ता जल्दी से जल्दी हमवार हो जाये। लेकिन वह, शैतान, इच्छाओं के अनुसरण, कुरआन की सही तरबियत से दूरी और मासूम इमामों (अ. स.) की विलायत और इमामत को क़बूल न करने की वजह से ग़लत रास्ते पर चल पड़े है। आज इस दुनिया में हर दिन नये ज़ुल्म व अत्याचार की बुनियादें रखी जाती हैं। पूरी दुनिया में ज़ुल्म व सितम बढ़ता जा रहा है और इंसानियत इस रास्ते के चुनाव से एक बहुत भयंकर नतीजे की तरफ़ बढ़ रही है। आज दुनिया की हालत यह है कि चारों तरफ़ ज़ुल्म व अत्याचार फैला हुआ है, बुराईयों का बोल बाला है, अखलाक़ी व सदाचारिक मर्यादाओं का अंत हो चुका है, शाँति व सुरक्षा का दूर दूर तक भी कहीँ पता नहीं है, ज़िन्दगी आध्यात्म व पवित्रता से खाली है, समाज में मातहत लोगों के हक़ों को पैरों तले रौंदा जा रहा है, यह सब चीज़ें ग़ैबत के ज़माने में इंसान का नाम ए आमाल है। यह एक ऐसी हक़ीक़त है जिस के बारे में मासूमीन (अ. स.) ने शताब्दियों पहले भविषय वाणी कर के इसकी काली तस्वीर पेश कर दी थी। तीसरा हिस्सा ज़हूर जिस वक़्त ज़हूर की बातें होती हैं तो इंसान के दिल में एक बहुत सुन्दर एहसास पैदा होता है जैसे वह नहर के किनारे किसी हरे भरे बाग में बैठा हुआ है और मधुर स्वर बुलबुलों की आवाज़ सुन रहा है। जी हाँ ! अच्छाइयों का प्रकट होना और अच्छाइयों का फैलना, थकी हारी रुहों व आत्माओं को ख़ुशिया प्रदान करता है, और इससे उम्मीदवारों की आँखों में बिजली सी चमक उठती है। हम इस हिस्से में हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के ज़हूर और उनके हुज़ूर के मौक़े पर घटने वाली घटनाओं का वर्णन करेंगे। और उस बेमिसाल जमाल को ग़ैबत का पर्दा उठाते हुए देखेंगे।
 
 
 
 
 
پاسخ شبهات عليه شيعه
 
सवाल जवाब सवाल- आयते ततहीर किस सूरे में है जवाब – सूर -ए- अहज़ाब आयत न. 33 सवाल- आयते विलायत किस सूरे में है ? जवाब- सूर -ए- मायदा आयत न. 55 सवाल- ياا يها الرسول بلغ ما انزل اليك من ربك किस सूरे की आयत है? महदवियत का दावा करने वाले जिस तरह से तारीख़ में बहुत से लोगों ने पैग़म्बर होने का दावा किया है, इसी तरहकुछ लोगों इमाम महदी होने का दावा भी किया है।
 
 
 
 
 
مباحث اجتماعي اسلام
 
नौरोज़ का विशेष कार्यक्रम जब जाड़ा विदा लेने लगता है और हवा की ठंडक कम होकर लुभावी हो जाती है। ठिठुरते दुबके खड़े वृक्षों पर सुहानी मुस्कान आ जाती है। सूखी झाड़ियों में खिलवाले फूल उपवन की मांग में सिंदूर भरने लगते हैं। वनस्पतियां अंगड़ाई लेकर अपने उपर जमी हुई बर्फ़ को तोड़ते हुए सिर बाहर हैं निकालती और वातावरण को निहारने लगती हैं। ऐसी स्थिति से पता चल जाता है कि बहार आ गई है। बसंत आता है तो अपने साथ ठंडी फुहारे लाता है और सब कुछ धुला धुला प्रतीत होता है। जहां तक नज़र जाए हरे-भरे मैदान, सुदंर प्राकृतिक दृष्य रंग बिरंगे फूल दिखाई देते हैं। यह देखकर मनुष्य का मन करता है कि उसका अपना अस्तित्व भी खिल उठे। वह अपनी इस मनोदशा और कामना को बयान करना चाहता है तो कुरआन की यह आयतें उसकी मनोकामना को शाब्दिक रुप दे देती हैं। महिला जगत- 1 आज कल T.V. , सिनेमा और कमप्यूटर गैम्स हमारे जीवन का अटूट अंग बन चुके हैं। हर परिवार में इनका प्रचलन है, शायद ही आज कोई ऐसा परिवार हो जो इस प्रकार के संचार माध्यमों से जुड़ा हुआ न हो। इन संचार माध्यमों के कार्यक्रमों में इतनी अधिक विविधता होती है कि लोग घंटों तक इनमें लगे रहते हैं। समय कैसे और कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता ।
 
 
 
 
 
اخبار شيعه
 
१५ खुर्दाद जून १९६३ में आंतरिक तानाशाही और विदेशी साम्राज्य के विरुद्ध ईरानी जनता का रक्तरंजित आंदोलन इस देश के समकालीन इतिहास में एक मोड़ है। ईरान में १५ ख़ुर्दाद के नाम से प्रसिद्ध आंदोलन वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद देश की दो बड़ी घटनाओं का मिलाप बिन्दु है। 15 खुर्दाद के आंदोलन से १० वर्ष पूर्व क़ानूनी एवं ईरानी जनता द्वारा चुनी गई सरकार अमेरिका, ब्रिटेन और शाह के दरबार के संयुक्त विद्रोह में अगस्त १९५३ में गिर गई और शाह पुन: ईरान लौट आया जबकि वह ईरान की क्रांतिकारी जनता के भय से देश से भाग गया था। १२ फ़रवर्दीन ईरान का इस्लामी लोकतंत्र दिवस २९ वर्ष पूर्व आज ही के दिन, कि जब ईरान की इस्लामी क्रांति को सफल हुए दो महीने से कम का समय बीता था, वर्ष १९७९ में २९ और ३० मार्च को आयोजित होने वाले जनमत संग्रह के परिणामों की घोषणा कर दी गयी। ईरानी जनता ने इन दो दिनों में आयोजित होने वाले जनमत संग्रहों में इतने विस्तृत पैमाने पर और बढ चढकर भाग लिया कि ३१ मार्च वर्ष १९७९ को घोषणा की गयी कि ईरानी जनता ने अपने लिए इस्लामी व्यवस्था का चयन किया है। इससे पहले कि इस विषय की उपलब्धियों और भूमिका के बारे में बात करें, इस बिन्दु का उल्लेख आवश्यक है कि इस जनमत संग्रह की अपनी अलग विशोषता है जो विश्व की बड़ी क्रांतियों के इतिहास में अद्वितीय है।
 
 
 
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